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आज घर-घर विराजेंगे गणपति: स्थापना के लिए 5 शुभ मुहूर्त, जानें बैठे और खड़े गणेश का महत्व

14 सितंबर को गणेश चतुर्थी के साथ गणेशोत्सव का शुभारंभ होगा। इस दिन गणपति स्थापना के लिए दिनभर में 5 शुभ मुहूर्त रहेंगे। धार्मिक ग्रंथों में घर की पूजा के लिए मिट्टी से बनी छोटी गणेश प्रतिमा स्थापित करने का विधान बताया गया है। प्रतिमा स्थापना के बाद रोज सुबह-शाम दीपक, दूर्वा, फूल और भोग अर्पित कर विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है। गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन करने से बचने का भी विधान है। गणेशोत्सव का मुख्य विसर्जन अनंत चतुर्दशी यानी 25 सितंबर को होगा।

जानिए गणपति स्थापना के लिए आवश्यक सामग्री, पूजा की सरल विधि, मंत्र, प्रतिमा का शुभ आकार और गणेशोत्सव से जुड़ी प्रमुख ग्रंथ कथाएं…

अमृत — सुबह 06.17 से 07.47

शुभ — सुबह 09.17 से 10.47

लाभ — दोपहर 03.17 से शाम 04.47

अमृत — शाम 04.47 से 06.17

अभिजीत मुहूर्त — सुबह 11.30 से दोपहर 12.50 तक

 

घर के लिए मिट्टी के बैठे गणेश शुभ, 9 इंच से बड़ी न हो प्रतिमा

1. मिट्टी के गणेश को पवित्र माना गया है

  • पंचतत्व: भूमि, जल, वायु, अग्नि और आकाश।
  • विवरण: मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पवित्र माना जाता है। इसमें पंचतत्वों का अंश होने के कारण धार्मिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व है।
  • पौराणिक मान्यता: गणेश पुराण के अनुसार, देवी पार्वती ने मिट्टी से गणेशजी की प्रतिमा बनाई थी। भगवान शिव ने उसमें प्राण प्रतिष्ठित किए, जिसके बाद वे गणेश के रूप में प्रकट हुए।

2. नदी या पेड़ के नीचे की मिट्टी से बना सकते हैं गणेश प्रतिमा

  • विवरण: गणेश प्रतिमा बनाने के लिए गंगा अथवा किसी अन्य पवित्र नदी की मिट्टी का उपयोग किया जा सकता है।
  • अन्य विकल्प: पीपल और शमी के पेड़ के नीचे की मिट्टी भी ली जा सकती है।
  • विशेष नियम: जिस स्थान से मिट्टी ली जाए, वहां ऊपर की करीब 4 इंच मिट्टी हटाकर नीचे की मिट्टी का इस्तेमाल करने की परंपरा बताई गई है।

3. घर में बैठे गणेशजी की छोटी प्रतिमा रखें

  • विवरण: घर में गणेशजी की हथेली के आकार के आसपास की प्रतिमा स्थापित करना शुभ माना जाता है। ग्रंथों में घर के लिए 12 अंगुल यानी करीब 7 से 9 इंच तक की प्रतिमा का उल्लेख मिलता है।
  • ध्यान रखें: घर में स्थापित की जाने वाली प्रतिमा 9 इंच से अधिक ऊंची न रखने की सलाह दी जाती है।
  • नोट: मंदिरों और सार्वजनिक पंडालों में प्रतिमा के आकार को लेकर ऐसा नियम लागू नहीं माना जाता।

4. स्थान के अनुसार गणेशजी के स्वरूप का महत्व

  • बैठे हुए गणेश: घर में 7 से 9 इंच तक की बैठे हुए गणेशजी की प्रतिमा शुभ मानी जाती है।
  • खड़े गणेश: दुकान, ऑफिस और कारखानों जैसे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में खड़े गणपति की स्थापना को शुभ माना जाता है।

    गणेश स्थापना और पूजा के लिए जरूरी सामग्री

    स्थापना के लिए

    • गणेशजी की प्रतिमा
    • साफ-सुथरी चौकी
    • स्वच्छ कपड़ा
    • पूजा के लिए आसन
    • पूजा की थाली

    मुख्य पूजा सामग्री

    • स्वच्छ जल
    • चंदन या कुमकुम
    • अक्षत यानी साबुत चावल
    • फूल
    • दूर्वा
    • धूप
    • घी का दीपक
    • रूई की बत्ती
    • कपूर

    स्नान और श्रृंगार के लिए

    • पंचामृत
    • छोटा वस्त्र या मौली
    • जनेऊ

    नोट: पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर को मिलाकर तैयार किया जाता है।

    भोग के लिए

    • मोदक या लड्डू
    • खीर
    • मौसमी फल
    • नारियल
    • पीने का स्वच्छ जल

    नोट: इच्छानुसार पान-सुपारी और दक्षिणा भी पूजा में रख सकते हैं।

    श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार करें पूजा

    गणेश पुराण में गणेश महोत्सव को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार मनाने की बात कही गई है। पूजा की कोई सामग्री उपलब्ध न हो तो पूजा रोकने की आवश्यकता नहीं है। जल, चंदन, अक्षत, फूल या दूर्वा, दीप और नैवेद्य से भी सरलता से गणेशजी की पूजा की जा सकती है।

    गणेशजी की पूजा विधि और मंत्र

    1. सबसे पहले घी का दीपक जलाएं और भगवान गणेश का ध्यान कर उन्हें प्रणाम करें।
    2. गणेशजी की प्रतिमा को स्वच्छ जल, दूध और पंचामृत से स्नान कराएं।
    3. प्रतिमा पर मौली चढ़ाएं, वस्त्र अर्पित करें और अष्टगंध या लाल चंदन से तिलक लगाएं।
    4. इसके बाद अक्षत, अबीर और गुलाल अर्पित करें तथा जनेऊ चढ़ाएं।
    5. भगवान गणेश को फूल और दूर्वा अर्पित कर मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।
    6. लौंग, इलायची, केसर, कपूर, सुपारी और कत्थे वाला पान भी अर्पित कर सकते हैं।
    7. अंत में गणेशजी की आरती करें, 21 बार प्रदक्षिणा करें और श्रद्धानुसार दक्षिणा अर्पित करें।

    पूजा का सरल मंत्र

    ॐ गं गणपतये नमः।

    गणेश जन्म का महत्व

  • शिव पुराण के अनुसार, पार्वती ने स्नान के समय अपने शरीर से निकले मैल से एक बालक बनाया और उसे द्वारपाल नियुक्त किया। माता की आज्ञा मानते हुए बालक ने शिव को भी भीतर जाने से रोक दिया। इसके बाद हुए युद्ध में उसका सिर कट गया। पार्वती की मांग पर हाथी का सिर लगाकर बालक को फिर जीवित किया गया। पार्वती ने वर दिया कि सभी देवताओं से पहले उसकी पूजा होगी। शिव, विष्णु और ब्रह्मा ने भी यह वर स्वीकार किया और सबसे पहले गणेशजी की पूजा की।

 

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